Mamta, Modi & INDIA alliance : Bengal का असली 'खेल' क्या है? - Kabrau Mogal Dham

Mamta, Modi & INDIA alliance : Bengal का असली ‘खेल’ क्या है?

नमस्कार दोस्तों स्वात है आपका द न्यू
लंचर के इस मच
परतों जिस प्र से इडिया गठबंधन में एक कर
साथ बिछड़ जा रहे हैं कुछ नीति तौ बि रहे

हैं कुछ भारतीय जनता पार्टी की वज से बि
रहे हैं तो कुछ दोनों तरफ अपने खेल खेल
रहे हैं नीतीश कुमार की राज आपको पता है
कि नीतीश कुमार एक जगह

दरवा और दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी
दोनों के साथ एक साथ मोल तोल की अद्भुत
कला नीतीश कुमार में क्यों राजनीति संतुलन

साधने की करते हैं अरविंद केजरीवाल भी
पहले कुछ इसी तरह की राजनीति करते हुए
दिखते प्रतीत होते थे लेकिन अब अरविंद
केजरीवाल के सामने साफसाफ विकल्प है कि

पंजाब में केरल फार्मूले पर कांग्रेस
बनाम आम आदमी पार्टी आमने सामने तो दिल्ली
में कांग्रेस और आम आ आदमी पार्टी के बीच
कहीं पाच दो की चर्चा है तो कहीं चार तीन

की चाहे जो भी फार्मूला हो कांग्रेस और आम
आदमी पार्टी के बीच प्रत्यक्ष गठबंधन
इंडिया गठबंधन के दायरे में केरल फार्मूला
भी चलेगा तो दिल्ली फार्मूला भी

चलेगा लेकिन सबसे बड़ा
सवाल कोई एमके स्टालिन पर नहीं है वह
यूपीए के समय से व गठबंधन सेट है हेमंत
सोरेन पर नहीं है वह गठबंधन भी ऑलमोस्ट

फिक्स है पूरी तरह से फिक्स है फारूक
अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती पर नहीं है व
भी गठबंधन तय है और महाविकास आघाडी के रूप
में जो क्षेत्रीय स्वरूप है इंडिया गठबंधन

का महाराष्ट्र में वहां भी दिक्कतें नहीं
है बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के साथ जो
गठबंधन है वहां भी दिक्कतें नहीं है बाकी

राज्यों में कांग्रेस पार्टी को अपने बूते
या अप या तो चुनाव अपने बूते लड़ना है या
अपने बूते कोई छोटे मोटे एकद सीट पर कोई

अलायंस करने हैं मोटे तौर पर मामला फिट है
सवाल पश्चिम बंगाल को लेकर है कि पश्चिम
बंगाल में ममता बनर्जी जी आखिर कर क्या

रही एक चर्चा यह होती है कि ममता बनर्जी
केरल फार्मूले के तहत जाना चाहती हैं केरल
फार्मूला यानी कांग्रेस सीपीएम गठबंधन
बनाम टीएमसी सभी 42 सीटों पर इस प्रकार

लड़े कि 42 की 42 सीटों पर भारतीय जनता
पार्टी तीसरे नंबर का रास्ता पकड़
ले लेकिन इसके इतर दूसरी बातें भी होती है
दूसरी बातें यह होती है कि यदि ममता

बनर्जी को इसी फार्मूले से चुनाव लड़ना था
तो सबसे पहले दलित प्रधानमंत्री का
मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम उछालने का
क्रेडिट वो अपने नाम क्यों करना चाहती

थी आपको याद होगा कि जब 2002 के
राष्ट्रपति चुनाव में अभी थोड़ा वक्त था
मुलायम सिंह यादव ने एपीजे अब्दुल कलाम का
नाम उछाल दिया अटल बिहारी वाजपेई की सरकार

थी महान रक्षा वैज्ञानिक भारत रत्न से
सम्मानित एपीजे अब्दुल कलाम का नाम
राष्ट्रपति पद के लिए जब मुलायम सिंह यादव
ने उछाला तो किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि

अटल बिहारी वाजपेई की सरकार आगे जाकर
एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर सहमति दे
देगी और एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर
अंततः अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने

सहमति दी वह राष्ट्रपति बने क्रेडिट
मुलायम सिंह के नाम गया क्योंकि उन्होंने
ही सबसे पहले कलाम साहब का नाम उछाला था
और अब इंडिया गठबंधन

क्योंकि मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम का
ऐलान करेगा ही समय जो भी हो दो दिन लग जाए
चार दिन लग जाए एक हफ्ते लग जाए ऐलान
करेगा ही तो निश्चित तौर पर इसका क्रेडिट

भी सबसे पहले मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम
सामने लाने वाले ममता बनर्जी और अरविंद
केजरीवाल के हिस्से जाएगा और अपने अपने
वोटर्स के बीच अपनी अपनी पॉलिटिकल कंसीट

के बीच इलेक्टोरल कां सिटंस के बीच चुनावी
क्षेत्रों के बीच इसका क्रेडिट लेने से व
पीछे नहीं हटेंगे लेकिन जब क्रेडिट लेने
से पीछे नहीं हटेंगे तो उनकी पार्टी को

सिर्फ दो सीटें देने की बात क्यों सीपीएम
को बाहर रखने की बात क्यों यह सारी बातें
दरअसल कुछ और इशारा करती है ताकि खड़गे
साहब का नाम उछालने का क्रेडिट भी

मिले और कांग्रेस पार्टी और लेफ्ट
पार्टियों के साथ सीटें भी साझा ना करनी
पड़े और बीजेपी के साथ भी कहीं ना कहीं एक
सॉफ्ट कॉर्नर बीजेपी का बना रहे देख पूरे

देश में मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम उछलने
से भारतीय जनता पार्टी के चुनावी नैरेटिव
को भारी घाटा होगा उसे विपक्ष में बैठना
पड़ सकता

है लेकिन पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता
पार्टी को घाटा होने के साथ-साथ ममता
बनर्जी जो दो धारी तलवार पर जो सियासत कर
रही है दो नाव की सवारी करती हुई ममता

बनर्जी जो दिखाई दे रही है वो भी एक तरफ
बीजेपी को कंफ्यूज करके रखो दूसरी तरफ
इंडिया गठबंधन के अंदर के प्राइम
मिनिस्ट्रियल कैंडिडेट का का क्रेडिट अपने

हिस्से में अपने राज्य के दलित वोटर्स के
बीच
डालो यह अजीब तरह की राजनीति है और इस
राजनीति को कांग्रेस और यूपीए के लोग भी

यानी इंडिया अलायंस जो यूपीए का नया
स्वरूप है वह लोग भी समझ रहे हैं भारतीय
जनता पार्टी भी समझ रही है ममता बनर्जी यह
भी जानती है कि गलती से भी हल्की सी भी

झलक कहीं मिल गई कि ममता बनर्जी पर्दे के
पीछे भारतीय जनता पार्टी के साथ एक सॉफ्ट
कॉर्नर के राजनीति कर रही है तो ममता
बनर्जी की सियासत को सियासत का खात्मा हो

सकता है बंगाल
में ममता बनर्जी की सियासत का आधार क्या
है बंगाल का 1617 प्र भद्र लोक और 32 फीसद
के आसपास का वहां का अल्पसंख्यक समाज जो

तकरीबन 50 फीसद के आसपास बनता है और यही
वोट उनके पिछले विधानसभा चुनाव में मिले
थे उन्हें ओबीसी के ज्यादातर वोट नहीं
मिले उन्हें दलितों का वोट करीब करब नहीं

मिला और यही वोट भारतीय जनता पार्टी का
आधार बने तो एक तरफ खड़गे साहब का नाम जिस
दिन औपचारिक रूप से ऐलान होगा ना तो मतवा
समाज में बीजेपी के लिए रास्ता बचेगा नाही

दलित समाज में बचेगा बाकी दलित समाज में
तो एक तरफ खड़गे जी का नाम उछाल करके जो
क्रेडिट बंगाल के हिस्से

में कांग्रेस के हिस्से में जाता वह
क्रेडिट ममता बनर्जी टीएमसी के फेवर में
करना
चाहते पहली बात दूसरी चीज कि उनको यह करके

बीजेपी को खड़गे साहब का नाम उछाल करर
खड़गे को पीएम कैंडिडेट डिक्लेयर करवाकर
बीजेपी को यह मैसेज देने की
कोशिश कि हमने हमारी बात रखने के बावजूद

हमारी इच्छा का कांग्रेस ने सम्मान किया
कि दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम
प्राइम मिनिस्ट्रियल कैंडिडेट बनाया इसके
बावजूद

टीएमसी ने कांग्रेस पार्टी को एक भी सीट
नहीं दी यानी इस रणनीति से बीजेपी को खुश
रखो और बीजेपी के साथ खुश रखने का एक ही
मकसद आप समझते

हैं वह यह है कि अल्पसंख्यक समाज के सामने
बंगाल में निश्चिंत की स्थिति नहीं आने
देना क्योंकि सभी जानते हैं कि कांग्रेस
वहां पर एक छोटी प्लेयर है असली लड़ाई

गांव गांव तक जो संगठन है वह सीपीएम का है
तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के अलावा जो
संगठन है व वाम मोर्चे का है कस्बे कस्बे
तक संगठन है जैसे ही टीएमसी कमजोर पड़ेगी

सीपीएम वहां एक बार फिर ताकतवर बनकर सामने
आएगी और जब टीएमसी बनाम सीपीएम की स्थिति
बनेगी तो अल्पसंख्यक मतदाताओं के सामने आज

की तारीख में जो माइनॉरिटी वोटर्स हैं
उनके सामने जो एक पॉलिटिकल कंपल्शन है
राजनीतिक मजबूरी
है कि बच्चा सो जा नहीं तो गब्बर सिंह आ

जाएगा ठीक उसी तरह से अल्पसंख्यकों के
सामने बंगाल में जो टीएमसी के लोग जिस
पॉलिटिकल कैपिटल को सबसे ज्यादा इस्तेमाल
करते
हैं कि टीएमसी के साथ बने रहो नहीं तो
बीजेपी घुस जाएगी तो इस नैरेटिव को बनाकर

रखने के लिए बीजेपी को खाद पानी भी देते
रहना बंगाल में ममता बनर्जी की मजबूरी
है और इसी मजबूरी को अब अल्पसंख्यक समाज
धीरे-धीरे समझ रहा है खड़गे साहब पीएम

कैंडिडेट यदि बनते हैं उम्मीद पूरी है कि
घोषित कर दिए जाएंगे यदि वो बनते
हैं तो उसका क्रेडिट सीपीएम और कांग्रेस
के गठबंधन को जाएगा

खड़गे साहब बंगाल में भी चुनाव प्रचार
करने जाएंगे और जब बंगाल में खड़गे साहब
चुनाव प्रचार करने जाएंगे तो मोदी जी भी
जाएंगे मोदी जी अपने वोटर को एड्रेस करने

जाएंगे खड़गे जी अपने वोटर्स को एड्रेस
करने जाएंगे और इस परिस्थिति में जब दलित
समाज बड़ी संख्या में खड़गे के पीछे खड़ा
हो जाएगा तो उस वक्त जिन सीटों पर भी

सीपीएम और कांग्रेस का गठबंधन बीजेपी के
सामने टक्कर लेता हुआ दिखेगा उन सीटों पर
अल्पसंख्यक मतदाता सीधे-सीधे
सीपीएम कांग्रेस अलायंस के साथ चले जाएंगे

इंडिया गठबंधन के दूसरे फॉर्म यानी अदर
देन टीएमसी टीएमसी के अलावा जो दूसरा
प्रमुख मोर्चा इंडिया गठबंधन के बैनर तले
वहां सीधे-सीधे खड़गे के फोटो और नाम के

साथ लड़ रहा होगा उसके साथ चला जाएगा यही
डर ममता बनर्जी को है और कहा तो यह भी जा
रहा है मैं नहीं जानता कितना सच है लेकिन
कहा तो यह भी जा रहा है कि अंदर खाने

बीजेपी के साथ एक डील हुई है जिसमें कहा
गया है
जिसमें माना जा रहा है कि एक तरफ सीबीआई
ईडी की कार्रवाई धीमी कर दी जाएगी और इसके

बदले में 18 सीटें तो वापस बीजेपी के लिए
जीत पाना संभव नहीं है लेकिन छ सात आठ
सीटों पर टीएमसी इस प्रकार से कैंडिडेट का
सिलेक्शन करे जिससे बीजेपी को सेफ पैसेज

मिल जाए सात आठ सीटें या छह सीटें बीजेपी
को बंगाल से लोकसभा की मिल जाए बीजेपी अभी
एक एक सीट की जद्दोजहद कर रही है अभी अगर
कांग्रेस सीपीएम और टीएमसी तीनों अलग-अलग

भी लड़ ले बंगाल में तब भी बीजेपी को 18
सीटें नहीं मिलनी है वो भी बीजेपी को पता
है कि जनाधार नीचे से खिसक रहा है और
एकमात्र जो अभी जनाधार दिख रहा है वो दलित

वोटों का दिख रहा है और जिस दिन खड़गे
साहब के नाम का ऐलान हो गया दलित
प्रधानमंत्री के नाम का ऐलान हो गया मत
भूलिए कि बंगाल में सामाजिक जागरूकता तबका

कोई भी हो भद्रलोक हो या दलित हो सामाजिक
जागरूकता आज से नहीं लॉर्ड कर्नवालिश के
जमाने से
है तकरीबन सवा 250 साल पहले से बंगाल में
जागरूकता का अतर देश के दूसरे हिस्सों की

तुलना में कहीं ज्यादा है तो चुनावी
हिंदुत्व को पीछे छोड़कर बंगाल के दलित
समाज के लोग मतवा समाज के लोग सीपीएम
कांग्रेस गठबंधन के साथ सिर्फ इस नारे के

आधार पर जुड़ सकते हैं कि इस देश को पला
दलित प्रधानमंत्री बनाने का ऐतिहासिक वक्त
करीब आ रहा है बीजेपी इससे डरी हुई है
क्योंकि ममता बनर्जी ने जिस प्रकार से नाम

उछाला केजरीवाल ने उन्हें समर्थन दिया
खड़गे साहब के नाम पर दोनों एकमत हुए व
कहीं ना कहीं कांग्रेस की भी उसमें मिली
भगत

थी सीपीएम की भी मिली भगत थी और अब चकि
नीतीश कुमार भी इस गठबंधन में नहीं है वह
जा चुके हैं एक मात्र रोड़ा जो माना गया
कि नीतीश कुमार की उपस्थिति में खड़गे
साहब के नाम का औपचारिक ऐलान बतौर पीएम

कैंडिडेट हो जाएगा तो नीतीश कुमार के लिए
एक ह्यूमिन की तरह
होगा उन पर कसे जाएंगे फब्तियां कसी
जाएंगी मीडिया सर्कल में मजे लिए जाएंगे

कि गए थे प्रधानमंत्री कैंडिडेट बनने पीएम
बनने वहां वह भी ना मिला और इधर से भी चले
गए तो अब नीतीश कुमार ने खुद ही वह रास्ता
दे दिया है कि अब आप खड़गे साहब को बना
दीजिए पीएम

कैंडिडेट तो उस परिस्थिति में ममता बनर्जी
के लिए टीएमसी के पॉलिटिकल सर्वाइवल के
लिए बीजेपी का वहां एक पॉलिटिकल फोर्स के
तौर पर दिखते रहना राजनीतिक मजबूरी है तो

दूसरी तरफ बंगाल का जो भद्रलोक है जो
आमतौर पर उदार वामपंथी मिजाज का माना जाता
है जैसे ही सीपीएम में थोड़ी ताकत दिखेगी
जैसे ही कांग्रेस में थोड़ी ताकत दिखेगी

वो अपना रास्ता बदलकर पुनः पुराने घर में
चला जाएगा वो घर वापसी करता हुआ दिखाई दे
देगा तो इन कई सारे फ्रंट पर बंगाल में जो
सियासत चल रही है उसका एक ही निष्कर्ष जो

साफ-साफ निकलता है कि तृणमूल कांग्रेस के
पास कोई अपना वोट बैंक नहीं है उसके वोट
बैंक की दो बुनियाद है दो बुनियादी पिलर
है एक उदार वामपंथी रुझान का भद्रलोक जो

कभी भारतीय जनता पार्टी के साथ नहीं जा
सकता और दूसरा अल्पसंख्यक समुदाय जो
भारतीय जनता पार्टी को बंगाल की सत्ता में
नहीं आने देना चाहता और यही वोट 49 50 पर

है बंगाल में आधा वोट है और इसको कैसे
अपने पास बनाकर रखा जाए और इसको बनाकर रखे
अपने पास बनाकर रखने के लिए बीजेपी की
कितनी अहमियत है है बीजेपी का डर दिखाने
की कितनी जरूरत है बंगाल में इसको ममता

 

बनर्जी से बेहतर तृणमूल कांग्रेस से बेहतर
कोई नहीं समझता
है और इस सियासत को देखते हुए पश्चिम
बंगाल में इंडिया गठबंधन के अंदर किस तरह
का स्वरूप है अभी यह कंफ्यूजन तब तक बना

रहेगा यह भ्रम की स्थिति तब तक बनी रहेगी
जब खड़गे का नाम बतौर प्रधानमंत्री
उम्मीदवार इंडिया गठबंधन के पीएम कैंडिडेट
के तौर पर सिर्फ और सिर्फ मीडिया गॉसिप का

चर्चाओं का हिस्सा बना रहेगा जिस दिन
औपचारिक ऐलान हो जाएगा उस दिन बंगाल की
परिस्थितियां पूरी तरह साफ हो जाएंगी ममता
बनर्जी के सामने भी एक ही रास्ता होगा कि

उन्हें करना क्या है और दूसरी
तरफ टीएमसी के साथ-साथ सीपीएम और कांग्रेस
के साथ बीजेपी के सामने भी एक ही रास्ता
होगा कि बंगाल का मामला अब निपटने से ममता

बनर्जी भी नहीं बचा सकती तो आगे करना क्या
है तो सियासत में कांग्रेस का एक
ऐलान जिसकी सभी प्रतीक्षा कर रहे हैं आने
वाले वक्त में ना सिर्फ पूरे देश का बल्कि

बंगाल स्पेसिफिक होकर भी बात करें तो
बंगाल की सियासत में टीएमसी और बीजेपी का
चुनावी नतीजा तय कर सकता है देखते हैं आने
वाले वक्त में क्या होता है लेकिन ममता

बनर्जी और बीजेपी के बीच अंदर खाने जिस
कथित डील की बात हो रही है वह कथित
डील कि आप मुझे ईडी से बचाओ और मैं आपको
बंगाल में बचा कर रखती

हूं तो इस डील में कितना दम है और इस तरह
की बातें जो कोलकाता से छनकर दिल्ली तक
आती है वह किस स्वरूप में आने वाले वक्त
में सामने आएगी यह वक्त बताएगा फिलहाल के
लिए इतना ही बंगाल की सियासत पर नजर रखना
बेहद महत्त्वपूर्ण है मौजूदा दौर में
नमस्कार

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