1:07 / 8:58 माँ काली को क्यों खून पीना पसंद है ? कोई नहीं जनता सच। - Kabrau Mogal Dham

1:07 / 8:58 माँ काली को क्यों खून पीना पसंद है ? कोई नहीं जनता सच।

कि आखिर क्या हुआ जब मां काली को रक्त

पीने की इच्छा हुई और आखिर ऐसी इच्छा

क्यों उत्पन्न हुई आज के इस खास वीडियो

में हम आपको यही बताएंगे आप देख रही है

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मिलती रहेगी हिंदू धर्म में देवी देवताओं

के साथ-साथ देवियों की भी पूजा की जाती है

जैसे देशों में त्रिदेव अर्थार्थ ब्रह्मा

विष्णु और महेश को सर्वश्रेष्ठ माना जाता

है उसी तरह देवियों में सरस्वती लक्ष्मी

और मां काली को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है

ऐसा माना जाता है कि देवी पार्वती ने ही

दुष्टों का संघार करने के लिए मां काली का

रूप धारण किया था दोस्तों आज की इस वीडियो

में हम आपको बताएंगे कि आखिर मां काली को

क्यों रक्त पीने की इच्छा

प्रवीण कंठ पुराण और दुर्गा सप्तशती की एक

कथा के अनुसार पौराणिक काल में शंकु शिरा

नामक एक अत्यंत बलशाली दैत्य का पुत्र

स्थित चरण हुआ था जो मनुष्यों की अस्थियां

चलाया करता था वह मनुष्यों के साथ-साथ

देवताओं पर भी अत्याचार किया करता था उसके

अत्याचार से तंग आकर एक दिन देवताओं ने

क्रोध में आकर उसका वध कर डाला उसी काल

में रक्तबीज नामक एक और दैत्य भी पैदा हुआ

जब यह बात उसे पता चली वह देवी देवताओं को

पराजित करने के उद्देश्य से धम्मा क्षेत्र

में ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए घोर

तपस्या करने लगा करीब लाख वर्ष बात

रक्तबीज के घोर तपस्या से ब्रह्माजी

प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उनसे वरदान

मांगने को कहा भगवान धम्मा को अपने सामने

देखकर रक्तबीज ने सबसे पहले उन्हें प्रणाम

किया और फिर बोला हे परमपिता अगर आप मुझे

वरदान देना चाहते हैं तो मुझे यह वरदान

दीजिए

मेरा वध देवता दानव गंधर्व या यक्ष पिशाच

पशु-पक्षी मनुष्य आदि में से कोई भी ना कर

सके मेरे शरीर से जितनी व्रत की बूंदे

जमीन पर गिरे उनसे मेरे ही समान बलशाली और

पराक्रमी और मेरे ही रूप में उतने ही

दैत्य प्रकट हो जाए तब ब्रह्मा जी ने कहा

रक्तबीज तुम्हारी मृत्यु किसी पुरुष

द्वारा नहीं होगी लेकिन इस्त्री तुम्हारा

वध आवश्यक सकेगी इतना कह कर ब्रह्मा जी

वहां से अंतर्ध्यान हो गये उसके पश्चात

रक्तबीज वरदान के अहंकार में मनुष्यों पर

अत्याचार करने लगा एक दिन उसने वर्ग के

अहंकार में स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया

और देवराज इंद्र को युद्ध के लिए ललकारा

आने लगा युद्ध में हराकर उसने स्वर्ग पर

अपना अधिकार कर लिया उसके पश्चात ,

वर्षों तक देवतागण रक्तबीज के भय से

मनुष्यों की भांति दुखी होकर पृथ्वी पर

चुका है

शेयर करने लगे उसके बाद इंद्र सहित सभी

देवी देवता गण पहले ब्रह्मा जी के पास गए

फिर सभी ने उनको अपनी व्यथा सुनाई तब

ब्रह्मा जी ने कहा मैं इस संकट में आप सभी

को नहीं निभा सकूंगा इसीलिए हम सभी को

विष्णु देव के पास चलना चाहिए फिर

ब्रह्माजी सहित सभी देवतागण श्री विष्णु

के पास गए परंतु विष्णु जी ने यह भी कह

दिया कि दत्त बीच को मारना मेरे वश में

नहीं है फिर सभी देवता वैकुंठ धाम से

कैलाश के लिए निकल पड़े लेकिन जब वहां

पहुंचे तो उन्हें पता चला कि भगवान शिव उस

समय कैलाश पर नहीं थे केदारनाथ क्षेत्र

में सरस्वती नदी के तट पर वह विराजमान है

तत्पश्चात सभी देवतागण केदारनाथ धाम

पहुंचे वहां पहुंचकर देवताओं ने भगवान शिव

को सारी बात बताई तब ब्रह्माजी ने शिव से

कहा कि शिव मेरे ही वरदान के कारण रक्त

बीच का देवता दानव यक्ष बीच पशु-पक्षी

मनुष्य आदि में से कोई भी उसका वध नहीं कर

सके

तंतु होते ही उसका पद अवश्य कर सकती है तब

भगवान शिव ने सभी देवताओं से आदिशक्ति की

स्तुति करने को कहा यानी कि मां शक्ति थी

फिर सभी देवताओं में रक्तबीज के वक्त की

अभिलाषा से आदिशक्ति की स्तुति करना शुरू

किया कुछ समय पश्चात देवताओं की स्तुति से

प्रसन्न होकर हिमालय से भी प्रकट हुई और

देवताओं से कहा हे देवगण अब दैत्यराज रक्त

भी इसे बिल्कुल निर्भय रहे मैं अवश्य उसका

बात करूंगी उसके बाद देवी से वर पाकर सभी

देवतागण अपने-अपने स्थानों को लौट गए रेड

दिन देवताओं ने नारद मुनि से कहा कि वे

रक्त बीच में ऐसी भती उत्पन करें जिससे वह

देवी के साथ किसी भी तरह का कोई अपराध

करने का विवश पूरा हो जाए उसके बाद नाराज

जी ने रक्तबीज के पास जाकर उसको उकसाने के

उद्देश्य से कहा कैलाश पर्वत के ऊपर भगवान

शिव का निवास स्थान है शिवजी को छोड़कर सब

क्वी देवता दानव तुम्हारी आज्ञा का पालन

करते हैं और तुमसे डरते हैं परंतु शिवजी

के साथ एक तांडवी नाम की एक अबला नारी

रहती है जिसे शिवजी के कारण देव-दानव कोई

भी उनसे जीत नहीं सकता तब रक्तबीज ने कहा

देवर्षि ऐसा क्या कारण है जो इसको कोई

नहीं जीत सकता फिर नाराज जी ने रक्त भी से

कहा कि तीनों देवों में से शिवजी सबसे

अधिक जितेंद्र और धैर्यवान है इसीलिए

देव-दानव नाद आदि कोई उनका कुछ नहीं

बिगाड़ सकता अगर तुम उन पर विजय प्राप्त

करना चाहते हो तो किसी तरह सबसे पहले उनका

धैर्य डिकाओ नारद जी के वचन सुनकर शिवजी

को मोहित करने के उद्देश्य से रक्त बीच

पार्वती के समान अत्यधिक सुंदर स्त्री

बनकर कैलाश पर्वत पर पहुंच गया उसके रूप

और यौवन को देख कर एक बार तो शिवजी मोहित

हो गये परंतु तभी पार्वती जी वहां आ

पहुंची यह देख शिवजी दुविधा में पड़ गए

फिर उन्होंने ध्यान योग से

कि पार्वती रूपी दैत्य रक्तबीज को पहचान

लिया तब उन्होंने क्रोध में आकर उस रात

दिया है दुष्ट तो कपट से पार्वती का पेस्ट

बनाकर मुझे चलने आया है इसीलिए महेश्वरी

पार्वती ही व करेगी भगवान शिव का अपमान

करने के बाद रक्त बीच अपने दरबार में आ

गया फिर मैं अपने राक्षस मंत्रिगण के साथ

शिवजी पर विजय प्राप्त करने की योजना

बनाने लगा उसने सबसे पहले अपने मंत्रीगण

से कहा कि यदि पार्वती मुझसे प्रेम करने

लगी तो शिव का धैर्य अपने आप ही नष्ट हो

जाएगा फिर पत्नी वियोग के कारण शिव कमजोर

हो जाएंगे और उसके बाद उसे हम आसानी से

चीज सकेंगे फिर उसमें अपने मंत्रियों को

बताया कि शिव ने उसे स्त्री के हाथों मरने

का शाप दे दिया है लेकिन यह नहीं जानता कि

मेरे सामने जब इंद्र सहित कोई भी देवता

नहीं टिक पाए तो भला मेरा वध एक स्त्री

कैसे कर सकती है इतना कहकर रक्त भी

जोर-जोर से हंसने लगा फिर थोड़ी देर बाद

उसने अपनी सेना को आदेश

ताकि तत्काल तुम लोग कैलाश जाओ और माता

पार्वती को प्रेमपूर्वक मेरे पास लेकर आओ

अगर वह प्रेम से नहीं आई तो उसे घसीटते

हुए ले आना इसके बाद राजा की आज्ञा का

पालन करते हुए दैत्यगण कैलाश पर्वत पर

पहुंचे और वहां से देवी पार्वती को अपने

साथ चलने को कहा दैत्यों की बात सुनकर

माता पार्वती क्रोधित हो गईं और उन्होंने

अपने रुकावट से दैत्यों को जलाकर भस्म कर

दिया उसी समय कुछ दैत्य किसी तरह वहां से

अपनी जान बचाकर रक्तबीज के पास पहुंची और

उसे माता पार्वती के पराक्रम के बारे में

बताया यह सुनकर रक्तबीज खुद उठा उसने अपने

सैनिको का एयर कहकर कारागार में डाल दिया

रक्त बीच चंड मुंड आदि जैसी असंख्य

व्यक्तियों के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच

और देवी के साथ युद्ध करने लगा कछुए में

माता पार्वती सभी देवताओं की शक्तियों के

साथ लड़ने लगी और चंड मुंड सहित सभी

दैत्यों का वध कर दिया परंतु रक्तबीज के

शरीर से जितनी भी रख की बूंदे धरा पर

गिरती

कि उसे उसके समान एक और दैत्यों पर हो

जाता इसीलिए अब तक उसका वध कोई नहीं कर

सका था फिर देवी पार्वती ने मां काली का

रूप धारण किया और अपने मुंह फैलाकर

रक्तबीज का खून की लड़की और इस प्रकार

अपने जी फैलाई जिससे कुछ रक्त भेजो को वह

अकेले ही निकल गई मुझको रक्त विहीन करके

मार दिया अंत में मुख्य रक्तबीज भी शूल

आदि शस्त्रों से मारे जाने और उसका खून

चूस ले जाने से रक्त विहीन होकर धरती पर

गिर पड़ा इस प्रकार देवताओं सहित तीन लोक

रक्तबीज के नाश से प्रसन्न हो गए और इस

तरह माता पार्वती ने लिया माता काली करूं

और माता का लिंक भी आ रक्तबीज का खून

दोस्तों अगर आपको मेरी यह खास जानकारी यह

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