माँ काली राक्षसों को देखकर रक्त की प्यासी क्यों हो गई ? | - Kabrau Mogal Dham

माँ काली राक्षसों को देखकर रक्त की प्यासी क्यों हो गई ? |

मां काली का रक्त पीने का करण क्या था मां

काली का रूप देखने में बड़ा ही भाया वह

लगता है उनके हाथों में कपाट रक्त से भारी

कटोरी लटकना नरमुंड और गले में मुंडो की

माला उनके रूप को और भी भाया भाई बना देता

है लेकिन क्या आप जानते हैं की आखिर किस

करण माता को ये रूप धरण करना पड़ा और वो

युद्ध भूमि में दैत्य का खून क्यों पीने

लगी एक कथा के अनुसार पौराणिक कल में शंकु

सिरा नमक एक अत्यंत बलशाली दैत्य का पुत्र

अस्थि चरण हुआ करता था जो मनुष्य की

अस्थियां चबाए करता था उसके अत्याचार से

टांग आकर एक दिन देवताओं ने क्रोध में आकर

उसका वध कर डाला इस कल में रक्तबीज नाम का

एक और दैत्य भी हुआ करता था जब ये बात उसे

पता चली तो वो ब्रह्म क्षेत्र में ब्रह्मा

जी को प्रश्न करने के लिए घर तप करने लगा

कुछ वर्ष बाद रक्त बिच के घर तपस्या से

ब्रह्मा जी प्रसाद पर होकर प्रकट हुए और

उससे वरदान मांगने को कहा तो रक्तबीज बोला

है परमपिता मुझे यह वरदान दीजिए की मेरा

वध देवता दानव गंधर्व यश पिशाच पशु-पक्षी

मनुष्य आदि में से कोई भी एन कर सके और

मेरे शरीर से जितनी भी रक्त की बंदे जमीन

पर गियर उनसे मेरे ही समाज बलशाली

पराक्रमी और मेरे ही रूप में उतने ही

दैत्य प्रकट हो जाए तब ब्रह्मा जी ने कहा

है रक्तबीज तुम्हारी मृत्यु किसी पुरुष

द्वारा नहीं होगी लेकिन स्त्री तुम्हारा

वध अवश्य कर सकेगी इतना कहकर ब्रह्मा जी

वहां से अंतर्ध्यान हो गए उसके पश्चात

रक्त बी वरदान के अहंकार में मनुष्यों पर

अत्याचार करने लगा और एक दिन उसने व के

अहंकार में स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया

और देवराज इंद्र को युद्ध में हराकर

स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया उसके

पश्चात वर्षों तक देवता गण रक्तबीच

के भैंस मनुष्यों की भांति दुखी होकर

पृथ्वी पर छिपकर विचारण करने लगे उसके बाद

इंद्र सहित सभी देवता गण पहले ब्रह्मा जी

के पास गए तब ब्रह्मा जी ने कहा मैं संकट

से आप सभी को नहीं उभर सकता फिर सभी देवता

गण विष्णु जी के पास गए परंतु विष्णु जी

ने यह कहते हुए माना कर दिया की रक्तबीज

को मारना मेरे भी वाश में नहीं है फिर सभी

देवता बैकुंठ धाम से कैलाश के लिए चल दिए

लेकिन जब वो वहां पहुंचे तो उन्हें पता

चला की भगवान शिवा उसे समय कैलाश पर नहीं

बल्कि केदारनाथ क्षेत्र में विनसमैन है

इसके बाद सभी देवता गण केदारनाथ धाम

पहुंचे वहां पहुंचकर देवताओं ने भगवान

शिवा को साड़ी बात बताई तब भगवान शिवा ने

सभी देवताओं से आदि शक्ति की स्तुति करने

को कहा फिर सभी देवताओं ने रक्त बीच के

वक्त की अभिलाषा से आदि शक्ति करना शुरू

किया कुछ इस समय पश्चात देवताओं की स्तुति

से प्रश्न हिमालय से एक देवी प्रकट हुई और

देवताओं से कहा की है देवगढ़ आपदा तेरा आज

रक्तबीट से बिल्कुल निर्भय रहे मैं अवश्य

उसका वध करूंगी उसके बाद देवी से बरपकर

सभी देवता गण अपने अपने स्थान को लोट गए

फिर एक दिन देवताओं ने नारद जी से कहा की

वह रक्त बीच में ऐसी माटी उत्पन्न करें

जिससे वो देवी के साथ किसी भी तरह का कोई

अपराध करने को विवश हो जाए उसके बाद नारद

जी ने रक्तबीज के पास जाकर उसको उकसाने के

उद्देश्य से कहा की तीनों देवों में से

शिवाजी सबसे अधिक जितेंद्र

में ए गया फिर वो अपने रक्षा मंत्रीगण के

साथ शिवाजी पर विजय प्राप्त करने की योजना

बनाने लगा उसने सबसे पहले अपने मंत्रीगण

से कहा की यदि पार्वती मुझे प्रेम करने

लगी तो शिवा का धैर्य अपने आप ही नष्ट हो

जाएगा फिर पत्नी वियोग के करण शिवा कमजोर

भी हो जाएगा उसके बाद उसे हम आसानी से जीत

सकेंगे फिर उसने अपने मंत्रियों को बताया

की शिवा ने उसे स्त्री के हाथों करने का

श्राप दे दिया है लेकिन वो ये नहीं जानता

की मेरे सामने जब इंद्र सहित कोई भी देवता

नहीं टिक सकता तो भला मेरा वध एक स्त्री

कैसे कर शक्ति है इतना कहकर रक्तबीज

ज़ोर-जोर से हंसने लगा फिर थोड़ी डर बाद

उसने अपनी सी को आदेश दिया की तत्काल तुम

लोग कैलाश जाइए और पार्वती को प्रेम

पूर्वक मेरे पास लेकर आओ और अगर वो प्रेम

से नहीं आए तो उसे घसीट हुए लाइए इसके बाद

अपने राजा की आजा का पालनपुर करते हुए

दैत्यगन कैलाश पर्वत पर पहुंच और वहां से

देवी पार्वती को अपने साथ चलने को बातें

सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गए और

उन्होंने अपने हुंकार से दैत्य को जलाकर

भस्म करने लगी इस समय

इसी तरह वहां से अपनी जान बचाकर रक्त बीच

के पास पहुंचे और उसे माता पार्वती के

पराक्रम के बड़े में बताया ये सुनकर

रक्तबीच क्रोधित हो उठा और उसने अपने

सैनिकों को कर कहकर कारागार में दाल दिया

फिर रक्तबीज चंद मुंड आदि जैसे असंख्यड़ा

के साथ कैलाश पर पहुंच और देवी के साथ

युद्ध करने लगा इस युद्ध में माता पार्वती

सभी देवताओं की शक्तियों के साथ लड़ने लगी

और चंद मुंड सहित सभी दायित्व का वध कर

दिया परंतु रक्तबीज के शरीर से जितने भी

रक्त की बंदे धारा पर गिरती उससे उसके

समाज ही एक और दैत्य उत्पन्न हो जाता

इसीलिए अभी तक उसका वध नहीं हो सका था फिर

देवी पार्वती ने मां काली का रूप धरण किया

और अपना मुंह फैलाकर रक्तबीज का खून पीने

लगी और इसी प्रकार अपनी जीत फैलाई जिससे

कुछ रक्तबीजों को निगल गए

अंत में मुख्य रक्तबीज भी सु आदि ए से

मारे जान वो उसका खून चूसें जान से रक्त

वहीं होकर धरती पर गिर पड़ा इस प्रकार

देवताओं सहित तीनों लोग रक्तबीच के नस से

प्रश्न हो गए इसी तरह मां काली ने और भी

कई व्यक्तियों और राक्षसों का वध किया यदि

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