महाकाली की अमृतधारा - Kabrau Mogal Dham

महाकाली की अमृतधारा

कि

[संगीत]

जय मां काली अति विकराली

शक्तिस्वरूपा

महाबलशाली जय हो त्रिशूल मुद्दा रिणियां

रुप चतुर्भुज धारी माता खड़ग खप्परधारी

माता गले में शोभा डे मुंडे की मामला

ओम नमो काली कंकाली

तेरा वर्ण नहीं जा ए साली करती हो जग की

रखवाली की

कि महक दिल्ली से डरता ख्याल रूप भयानक

प्रति विकराल मां कीर्तन का रंग है खिला

जब-जब हुई धर्म की हानि बाढ़ै असुर अधम

अभिमानी

तब-तब उधर आप काली माई

कलकत्ते में रहने वाली जय हो मां

दक्षिणेश्वरी काली मुख्य कर तेरे पास

तेरी महिमा

अपरंपार देती भी प्यारा का भंडार जो भैया

तेरे द्वार

दारुण में उत्पात मचाया

ऋषि-मुनि देवताओं को एकता या दारुण से सब

देवगण हरे

पार्वती मां चोद मिठाई शिव के तन-मन-धन

जाणी तमोगुण लेने बाहर आई

पार्वती तू बनी महाकाली वितरण में प्रलय

मचाने वाली श्याम वर्ण कंट्री नीला

मां काली तेरे द्वारे लगी भक्तन की भीड़

जुटनी कल्याण करो हर भक्तन की पीर पीर ओम

जयंती मंगला काली चरण की बिगुल बजाने वाली

तेरा वचन ना जाए खाली है

झाले रणनीति दारुण सन् में ख्याल आया तेरा

स्वरूप देख घबराया रण में तुमने प्रलय मचा

हुआ था

[संगीत]

रक्तबीज जबरन में आया कि देवताओं को मार

गिराया देवता हार की फिक्र

यज्ञ धरा पे बंद कराया असुर बहुत उत्पात

मचाया देवतागण कैलाश

शेद

ब्रह्मा जी नी सब को बताया मुझसे है वरदान

पाया देवताओं पर विजय पा हूं

उधर आप रख जो मेरा गिरेगा रक्त हिप्पीज

अधिक तरीघाट जन्मों सुई ए मेरे समान हुआ

था सुनने के ड्रम हटा वरदान सभी देव हो गए

हैं राजन पार्वती मात्र विरोध में आई

भीषण गर्जन अमान लगाया तीनो लोक भय से

थर्राया बन जाएगी अष्टभुजी महारानी

रक्तबीज की सामने आई अट भुजा में शस्त्र

उठाई रणबीर भीषण हुआ तीन भयंकर बाढ़

रक्त द्विज का लहू पी डाली क्रोधित हुई रण

मे महाकाली चारों तरफ मन चाहा झाला का

झाल जज विजय असुरों की सेना काली भरी ऊंचा

फिर लगा कि महा प्रलय होगा टो करने लगी

संघ का धार फिर हम में कालिख जो भी

ब्याहता उसका वध कर देती माता दी एवं

अनुसार घबरा एपी

की प्रवृति हुआ था खून समाप्त बहती धारा

पीरत कि दांत रक्त सिधारा हो गई लाल

कांपने लगी धरा पाताल

जीव-जंतु हो गए बेहाल महादेव भोले के

पास

भोले नाथ सीरवी लगाएं

महाकाली से अप बचाएं नहीं तो कोई बच नहीं

पाए

मुद्दों कि शंभू सुनने पुकार चल नंदिश पे

हो के सवार

महाकाली को क्रोधित पकड़

महक दिनांक पावड़ा या कुछ भी नम आंखें समझ

में काया नीचे शिव शंकर को पाई

असली रूप में मान्यता थी कि देख संभोग को

मां मुसकराई सभी देवगण हुए खुशहाल

अष्टभुजी सुख दायक माता दुष्ट दलन जग

भाग्यविधाता भाल विशाल मुकुट छवि छाजै

रूप भयंकर जब तुम धरती दुष्टों का संहार म

करती ऋषि-मुनि भक्त कर तेरी सूझा लो

दूजे हाथ लिए मधु प्याला पी लीजिए कर्मी

तो हट वाला चौथी कर्मी खड्ग विराजे हैं

कैसा रहा जय जय काली कलि मल हरण

महिमा अगम अपार

भक्तों पर मां काली का सदा बरसता प्यार

छठवें कर्मी सोहित त्रिशूल नाशिक अरे

शत्रुओं का फुल सप्तम कर्दम तत्व टिप

प्यारी ईएस

भक्तों का भला करे मां भवानी निश दिन जब

ऋषि मुनि ग्यानी कलिकाल के कष्ट को अतिथि

है कि जो भी धरती तेरा श्यान खुशी का करती

हो गला काटकर हुकूमत भक्तन रखवाली राधे

मैं तेरे वक्त कि तीन दुखारी आया शरण महत

तुम्हारी कृपादृष्टि मुझ पर भी कह दो दो

कि प्रेम सहित जो कि व्रत कविता भवबंधन से

मुक्ति

पावै काली नाम कलियुग में

धारा है

कि महिषा सुर और असुर बलशाली देवलोक

करवाया साली धरती पर उत्पात मचाया

प्राणी चाहे देवता पुकारे सुर नर मुनि जन

हो ही पुकारे सब मिल जाए तेरे

स्वरूप

महिषासुर ने ऊधम मचाया संघ में भारी से ना

लाया शुरू हुआ भीषण संग्राम में

कि महिषी सवारी लेकर हराया समझ न पाया

तेरी माया महिषासुर की मति गई मारी ईएस

करने लगा वार-पर-वार वितरण में बेहरत

किदार भारी से न लें सन् में ख्याल

जय महिषासुर मर्दिनि सुन लो मेरी पुकार

मां मेरी रचा करना विनय है भ्रम बॉल है

[संगीत]

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